थोड़ी दुनिया मेरी भी

मैं कभी कभी सोचता हूँ कि समाज हमारे लिए दायरे किस हद तक बना सकता है. वो क्या सीमा है जहाँ हम समाज को ये हक से कह संकें कि इसके आगे आप को नहीं दखल देना चाहिए. और हर बार मैं यही समझ पाया कि या तो समाज को दखल देने का हक है या फिर नहीं ही है; ऐसी कोई हद नहीं हों सकती जो समाज और एक व्यक्ति की सीमाएं तय कर संकें. इसी असमंजस में एक नज़्म लिख रहा हूँ. सुनिए..

वहां भी तुम्हारी सुनकर,
कोई रोया फूट-फूट कर.
यहाँ भी कोई लड़कर,
टूटा आखिर जूझ-जूझ कर.

तमाशा ताकें आँखें मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.

तेरी हर एक बात सुनी,
पर ये मेरी दहलीज़ है,
झूठे अंधे कानून सुने,
जज़्बात भी सभी नाचीज़ हैं.

चीत्कारों के बीच में है एक चीख मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.

ज़ख़्मी जानवर के लिए भी
उनको तड़पते देखा मैंने.
इंसान के लिए नफरत से,
बस इतना ही सीखा मैंने.

यहाँ दफ़न लाशों में एक लाश है मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.

बहुत रूठकर भी मैं यही कह पाया,
बुस्दिली में है एक आवाज़ मेरी भी.
तू जीता, मैं लांग न पाया,
इस दायरे में है फिर भी, एक दुनिया मेरी भी.

आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.

' अतुल '
14 Responses

  1. mahesh Says:

    अद्भुत है आपकी परिभाषा समाज की.


  2. aranya Says:

    सुन्दर भाव और सशक्त अभिव्यक्ति. विशिष्ट.


  3. Neha Says:

    beautifully put. very simple and graceful.


  4. राहुल Says:

    समाज के खिलाफ इस लड़ाई में, आपकी विजय हों. सुन्दर. अतिसुन्दर.


  5. anuj Says:

    a gem of a poem. you are getting better day by day. happy new year.


  6. Atul Says:

    ज़माना वो शय है जो है साथ में बस गंवाने के लिए,

    हमजाद पंची हैं, ज़माना है तो बस ज़माने के लिया.


  7. Atul Says:

    aazaad likhna chaah raha tha.


  8. vibhore Says:

    आपका अंदाज़ बहुत पसंद आया. मुबारक.


  9. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com
    Email- sanjay.kumar940@gmail.com


  10. aalekh Says:

    samaj mein main aur aap donon hi hain. jaayein to bachkar kahan jaayein. sundar vicharabhivrakti.


  11. narayan Says:

    ladai jaari rakhiyega. jeet awashya hogi.


  12. richa bhatnagar Says:

    pecheeda sawal uthaya aapne.shubhkamnayein.


  13. mere rone par kia kinara usne
    hasne par muh mitha karane k vaade liye
    ye vo samaj ha dost mere
    jo ha keval hame darane k liye...

    Ek acchi kavita k liye badhayi..yu hi bebak likhiye...
    shubhkamnaye...


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