मैं सो जाऊँ तो


मैं सो जाऊँ तो

जो मैं सो जाऊं तो, कोई आहट हा होने देना,
थकी ज़िन्दगी की थकान है, ज़रा देर और सोने देना.

जो सुनना वीरानों में किसी मायूस की रुदाली,
मेरी तन्हाई न बांटना, बस यूँ ही अकेले रोने देना.

न खोजना मुझे किसी दिन, किसी निशानी के बहाने,
मेरी तस्वीर को मेज़ पर ही किसी किताब में खोने देना.

उठने देना उन उँगलियों को जो मेरी ओर उठेंगी,
दामन पर मेरे दाग पुराने हैं, वक़्त को वक़्त से धोने देना.

--- ' अतुल '

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2 Responses
  1. Atul your poem is too good. I like the way you wrote it.
    But I want to suggest you one thing, please change the appearance of your site and try to change gaps between font too...
    Aapaki Kavita me Char Chand Lag Jayenge...
    Thanks.


  2. S B Tamare Says:

    Nicely balanced poem but feels annoyed with life belie all the happiness. Thanks


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