नज़्म : सांस तुम्हारी होती है

एक लम्बे विराम के बाद मैंने कलम को तकल्लुफ दिया है | और ये मानना इमानदारी होगी कि कुछ अच्छा ज़हन में आ भी नहीं रहा था | कुछ यूं हुआ कि पुरानी बातें फिर सामने दोहराने लगीं | लगा कि मैं तो कहीं और ही चला गया था | सब कुछ वैसा ही तो है | अब आखिर अपने इतिहास से कोई कितना भाग सकता है | बस इतना सोचा ही था कि यह नज़्म ज़हन में आ गयी | जाने अनजाने में मुहब्बत किसी न किसी बहाने से जिंदा रह ही जाती है | लिखा है .......

तन्हाई में मेरी मुझसे हर बात तुम्हारी होती है,
धड़कन खामोश है सीने में पर सांस तुम्हारी होती है |

आखिर में जी कर हर शय को मिटना ही तो होता है,
नाज़ुक है, इस वीराने में भी आवाज़ तुम्हारी होती है |

ना जाने किस मोड़ पे गिर कर राह नई ढूंढी हमने,
मैं भटक गया पर यहाँ से हर राह तुम्हारी होती है |

आँखों में ख्वाब लिए चलता हूँ कब कोई आहट हों जाये,
हर दिन तो तेरा था कबसे अब हर रात तुम्हरी होती है |

थोड़ी सी नीयत बुरी भी थी पर दिल मेरा नादान था,
अजी दिल तोड़ने की अदा भी ख़ास तुम्हारी होती है |

जायज़ क्या और क्या नाजायज़, इस बात पर क्यूँ अड़ना,
इबादत मेरे करने से तबियत क्यूँ नाराज़ तुम्हारी होती है |

' अतुल '
1 Response
  1. ehsaan Says:

    khoob
    bahut khoob


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