ग़ज़ल : इस शहर का दस्तूर

इस शहर का तो लगता यही दस्तूर है,
यहाँ मुहब्बत को इबादत नहीं कहते.

परछाई बनकर देखो कि जीना क्या है,
मेरे होने को यहाँ हकीकत नहीं कहते.

यहाँ ज़माने से लड़ना बगावत है,
मुहब्बत में मिटने को शहादत नहीं कहते.

महबूब यहाँ बिछने को कालीन होते हैं,
खूब है यहाँ महबूब को हसरत नहीं कहते.

किसी की चोट पर जान निकलती है,
इस मर्ज़ को यहाँ मुहब्बत नहीं कहते.

मेरे सीने के घाव उनके तोहफे ही हैं,
उनके किसी वार को हम नफरत नहीं कहते.

- "अतुल"
3 Responses
  1. mahesh Says:

    nayab .. bahut sunder


  2. neha Says:

    bav vibhore kar diya
    kya baat hai.


  3. shashi Says:

    bahut khoob likha apne.


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