ग़ज़ल : गम न होता

शायद तेरी बेवफाई का हमें इतना गम न होता,
अगर दिल में सैलाब मुहब्बत से कम न होता |

बहुत सी करवटें तेरे बिस्तर में अरमान लेते मेरे,
तेरी चादर से बड़ा अगर दिल का वहम न होता |

कुछ दिख जाती दरारें भी रिश्तों की दीवारों में,
अगर इस बारिश को दीवारों पे रहम न होता |

न किस्सा सुनाना किसीको, हसेंगे तुमपे मेरी जां,
ये किस्सा नहीं ये हादसा है जो ख़तम न होता |

चले जाओ भले रुकने से अब क्या फ़ायदा होगा,
हर घाव भरने के लिए वक़्त का मरहम न होता |

'अतुल'
2 Responses
  1. Aditya Bajaj Says:

    वाह... शानदार ! बहुत खूबसूरत रचना !



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