कब तक इंतज़ार

शाम ढली अब क्या जतन हर बार करे,
दिल कमज़ोर है, कब तक इंतज़ार करे |

धागे रिश्तों के कमज़ोर हैं ये जानते हैं,
जो ये घाव सिये तो अंग भी बेकार करे |

उठा के सपनों का बोझ पलकों पे चले,
गिरे तो खुदको, रहे तो चलना दुश्वार करे |

सोचा बहुत कि मंजिल के आगे बढ़ जाएँ,
ये दिल है  नादाँ, हर मंजिल पे प्यार करे |

नदी चली आती है आगे थोड़ी बावफा है,
कटे घुले भले पर आखिर क्या कगार करे |

छोड़ भला क्या और बुरा क्या होना है,
जंग है दिल की, ये जीते को भी हार करे |

'अतुल'
5 Responses
  1. कल 28/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!


  2. उठा के सपनों का बोझ पलकों पे चले,
    गिरे तो खुदको, रहे तो चलना दुश्वार करे |


    खूबसूरत गज़ल


  3. सदा Says:

    वाह ...बहुत बढि़या ।


  4. अच्छी कहन...
    शुभकामनाएँ...


  5. बेहतरीन गजल ..शुभ कामनाएं !!!


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