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जो अरमान बूढे पैदा होते हैं, जवान नहीं होते,
आजकल मेरे रोने पर पड़ोसी मेरे हैरान नहीं होते।
तार्जुब होता है की अंधेरे ने हमें मारा है डराकर,
यहाँ तो अंधे भी दिए जलाते हैं परेशान नहीं होते।
छटपटाते बदन के सीने में कोई खंजर देदे,
नेक लोग यहाँ , एक से तमाम नहीं होते।
कब्रिस्तान में मुझसे कई बस यूँ ही लेते हुए थे,
लाशों पे उनके मौत के कोई निशान नहीं होते।
ज़िन्दगी की गुलामी एक अरसे से है की मैंने, फिर क्यूँ,
मेरे सपने मेरी हकीकत के गुलाम नहीं होते।
ये कोई ज़िन्दगी नहीं न मौत का ही ज़िक्र है,
ये तो मुहब्बत है, इसके सिलसिले कभी आसान नहीं होते।
- ' अतुल '

नन्हे हाथों में कांच के बर्तन चटक जो जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
घुल जाते मिसरी जैसे पानी में ,
गिर पड़ जाते हैं नादानी में ,
कंचों के खेल खेल जाते ,
कुछ कुछ दूर और ठेल जाते .
वोह खेल स्कूल से दूर किसी सड़क को जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
कुछ मुस्कान अभी थी बाकी ,
सपने सभी थे अभी तक साथी ,
किसी और दुनिया में चलते हर पग ,
बचपन के कांच से देखा था जग ,
उस दुनिया के उमंग महल तोह पलक झपक खो जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
- ' अतुल '
