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ग़ज़ल


ग़ज़ल

मेरी हर सदा के बदले एक आवाज़ तो दे,
पास है तो अपने होने का एहसास तो दे.

मजबूर हूँ के मैं छू नहीं सकता तुझको,
गम न कर मेरी साँसों को अपनी साना तो दे.

तेरी मौजूदगी मेरी तन्हाई को डराती है,
आने से पहले मेरी देहलीज़ पर खाँस तो दे.

हर ग़ज़ल है अधूरी, इस बात से वाकिफ हूँ,
सुर बैठेंगे लव्जों पर तू ज़रा साज़ तो दे.

हम भी फ़िदा होने की काबीलियत रखते हैं,
तू हमें अपनों में ओहदा कोई ख़ास तो दे.


*

ग़ज़ल - प्यार के लिए


प्यार के लिए

मौत आती है इकरार के लिए.
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

अब इशारे भी ज़िन्दगी के लिए हैं कम,
खामोशी ने तेरी तोडा हरदम.
कह उठते हैं वो इनकार के लिए,
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

हम पहचान में अजनबी लगते हैं,
तेरे अपने सभी ये कहते हैं.
सफाई देते हैं रिश्तेदार के लिए,
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

हर पल सोचते हैं हो दीदार का,
उनके दर्द-ए-इज़हार का.
हर घडी ठहरती है इन्तेज़ार के लिए,
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

सांस रुकने को ज़ख्म कितने काफी हैं,
कौन जाने कितने अभी बाकी हैं.
घाव खुलते हैं हर बौछार के लिए,
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

वो दर्द, थी ज़िन्दगी जिसमे,
वो सितम, थी हर ख़ुशी जिसमे.
मरते हैं मुझे वो हर बार के लिए,
जब सोचते हैं जिएँ प्यार के लिए.

-'अतुल'


ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुमने ये क्या कह दिया

मेरी ज़िन्दगी अभी थी बाकी और कुछ एहसास अनछुए से थे,
आह भी नहीं निकली बदन से तुमने धीरे से ये वार कैसा कर दिया.

सो गया था नींद गहरी बड़े अरसे से ये आँखें मेरी जागी ही थीं
अरे! प्यार की आड़ में किस ज़ख्म पर तुमने हाथ अपना रख दिया.

और धीरे से रोने को न कहना ये बड़ी ही ज्यादती हो जायेगी,
मैं हूँ अकेला, गूंजता हूँ, तू कौन है जो मेरे रोने से डर के चल दिया.

इतनी क़यामत है ज़िन्दगी की किसी का डर नहीं बाकी मुझमे,
मैं कच्चे खाक का बुत था, तुने प्यार से ख़ाक मुझको कर दिया.

ऐसी भी बेशर्मी के न कायल बनो, अजी खुदा सभी को देखता है,
खूब खेला मेरे आंसुओं से और जाने से पहले रुमाल पीछे रख दिया.
-- ' अतुल '



ग़ज़ल


क्यों

इस शहर में डूबते जज्बात पूंछते हैं,
हर आदमी यहाँ इंसान क्यों नहीं होता.

मेरे पूछने से पहले ही ये दास्तान सुनाई गई,
इस मुलाकात का कोई अंजाम क्यों नहीं होता.

इतनी दौलत है यहाँ मंदिर मस्जिद में ,
फिर यहाँ नेकी करना आसान क्यों नहीं होता.

हवा वही है, मौसम वही है सदियों से यहाँ,
फिर सुकून से यहाँ कोई काम क्यों नहीं होता.

नेकी फौलाद का ईमान चाहती है, इसलाम नहीं,
अजी, हर बशर यहाँ मुसलमान क्यों नहीं होता.

-- ' अतुल '
*


ग़ज़ल : इंसानों की भीड़ में


इंसानों की भीड़ में

इंसानों की भीड़ में मुझे न कहीं इंसान दिखे.

मुझे मंदिर दिखे, मस्जिद दिखे, हिन्दू दिखे, मुसलमान दिखे,
पर मस्जिद में अल्लाह न दिखे, मंदिर में न भगवान दिखे.

बिकते हुए सपने दिखे, बिकते हुए अरमान दिखे,
दुनिया के इस बाज़ार में लेकिन, फौलाद के न इमान दिखे.

टी वी दिखी, विडियो गेम्स दिखे, फिल्में दिखीं, शाहरुख़ खान दिखे,
चार साल के बच्चे भी अब मुझे न मासूम दिखे, न नादान दिखे.

परमाणु दिखे, नागासाकी दिखे, इराक और अफगानिस्तान दिखे,
मुझे सपने में दुनिया के नक्शे पर, न पाकिस्तान दिखे, न हिंदुस्तान दिखे.

--' अतुल '

*





ग़ज़ल


ग़ज़ल

हर किसी से यहाँ धोखा ही मैंने खाया है,
कौन अपना है और कौन यहाँ पराया है.

ले चुके है साँसे अपने हिस्से की लगता है,
अब तो हर सांस का लगता नुझे किराया है.

मेरे आंसू यहाँ किसीको नहीं भिगो सकते,
बस महफिल में एक मुद्दा नया उठाया है.

कुछ पहले इसी भीड़ ने पैगम्बर मुझे कहा था,
कुछ पहले ही इन्होंने शैतान मुझे बताया है.

तेरे आगे सब झुकाते हैं मैं भी झुका देता हूँ,
पर सजदे में नहीं मैंने तो बेबसी में सर झुकाया है.

--- ' अतुल '

*

मैं सो जाऊँ तो


मैं सो जाऊँ तो

जो मैं सो जाऊं तो, कोई आहट हा होने देना,
थकी ज़िन्दगी की थकान है, ज़रा देर और सोने देना.

जो सुनना वीरानों में किसी मायूस की रुदाली,
मेरी तन्हाई न बांटना, बस यूँ ही अकेले रोने देना.

न खोजना मुझे किसी दिन, किसी निशानी के बहाने,
मेरी तस्वीर को मेज़ पर ही किसी किताब में खोने देना.

उठने देना उन उँगलियों को जो मेरी ओर उठेंगी,
दामन पर मेरे दाग पुराने हैं, वक़्त को वक़्त से धोने देना.

--- ' अतुल '

*

ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुमसे जुदा मेरी ज़िन्दगी का ये रास्ता है.

दिल न जाने मुहब्बत क्या चीज़ होती है,
बस इतना ही जाने की दिल तुम्हें चाहता है.

कौन है वो जिससे हर सांस पाक होती है,
कौन है वो जिसे हर दुआ में दिल मांगता है.

क्यों है दिल को गम तुमसे दूरी का ये सोचता हूँ,
पलकों में ही रहते हो ये बात नहीं जानता है.

ये हिचकी मुझे सताती है क्यों कबसे बेवजह,
ये तेरी ही याद का है असर दिल खूब पहचानता है.
-- ' अतुल '

*

दुआ

दुआ

बस एक दुआ सुन ले मालिक बेआब रहूँ बर्बाद रहूँ.


ज़ख्म खा कर हसने को मैं ज़ुल्म बड़ा ही समझता हूँ,

मैं चीखके पुकार सकूं, मैं कमज़ोर रहूँ आज़ाद रहूँ.


हर फ़िक्र से मुझको लगता है जान अभी भी बाकी है,

मैं अब मरने के ही बाद जियूं, मरने के ही बाद रहूँ.


और ढूंढकर मारेंगे मेरे चाहनेवाले पत्थर मुझको,

बड़ा बदनाम है ये नाम मेरा, इसी नाम से सबको याद रहूँ.


मेरे टूटने की गुजारिश कईयों की ख्वाहिश है कबसे,

यूँ ही किसी की ख्वाहिश रहूँ, किसी दिल की फरियाद रहूँ.


--' अतुल '


*

बचपन भटक जो जाते हैं


नन्हे हाथों में कांच के बर्तन चटक जो जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


घुल जाते मिसरी जैसे पानी में ,

गिर पड़ जाते हैं नादानी में ,

कंचों के खेल खेल जाते ,

कुछ कुछ दूर और ठेल जाते .


वोह खेल स्कूल से दूर किसी सड़क को जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


कुछ मुस्कान अभी थी बाकी ,

सपने सभी थे अभी तक साथी ,

किसी और दुनिया में चलते हर पग ,

बचपन के कांच से देखा था जग ,


उस दुनिया के उमंग महल तोह पलक झपक खो जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


- ' अतुल '

गज़ल

गज़ल

बिना समझे मुझे कहते हैं तुम्हें समझना है नामुमकिन ,
कोई एक मर्तबा ही सही कोशिश करके तो देखे.

हमदर्दी के काबिल तो समझा सबने, मुहब्बत के लायक नहीं,
कोई तसव्वुर में सही मुझे एक बार उस नज़र से तो देखे.

मेरी ज़िन्दगी हो बेमंजिल, मेरा जीना बेमतलब ही सही,
पर मेरा काम है मुश्किल, कोई रातभर आहें भर के तो देखे.

कौन कहता है नशा बस शराबी ही जाना करते हैं,
कोई जाए और किसी बेवफ़ा से मुहब्बत कर के तो देखे.

नासमझी नहीं कहते गैरत रखने वालों से मुहब्बत करने को,
क्या सुकून है बेहोशी में, वो होश किसी के नाम करके तो देखे.
--' अतुल '

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