shayari लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
shayari लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

ग़ज़ल

ग़ज़ल

तुमने ये क्या कह दिया

मेरी ज़िन्दगी अभी थी बाकी और कुछ एहसास अनछुए से थे,
आह भी नहीं निकली बदन से तुमने धीरे से ये वार कैसा कर दिया.

सो गया था नींद गहरी बड़े अरसे से ये आँखें मेरी जागी ही थीं
अरे! प्यार की आड़ में किस ज़ख्म पर तुमने हाथ अपना रख दिया.

और धीरे से रोने को न कहना ये बड़ी ही ज्यादती हो जायेगी,
मैं हूँ अकेला, गूंजता हूँ, तू कौन है जो मेरे रोने से डर के चल दिया.

इतनी क़यामत है ज़िन्दगी की किसी का डर नहीं बाकी मुझमे,
मैं कच्चे खाक का बुत था, तुने प्यार से ख़ाक मुझको कर दिया.

ऐसी भी बेशर्मी के न कायल बनो, अजी खुदा सभी को देखता है,
खूब खेला मेरे आंसुओं से और जाने से पहले रुमाल पीछे रख दिया.
-- ' अतुल '



साँस है पर साज़ नहीं

साँस है पर साज़ नहीं


इतनी सी ही तो बात है, साँस है पर साज़ नहीं,

एक गीत जुबां पर आता है, याद है पर याद नहीं.


बीते लोगों को भूल भी जाएँ, पर नज़रें राह तकती हैं,

कानों में मोहल्ले का शोर है, उनके क़दमों की आवाज़ नहीं.


जो बरकत में खेलते हैं लुक्का छुप्पी के खेलों को,

उनकी आँखों में राह कई हैं, पर राहों पर आँख नहीं.


हवा भी गिरकर सागर से कभी न कभी जा मिलती है,

पर खुदसे छुपते तुमसे हमको अपने मिलने की आस नहीं.


वक़्त के आगे सुना झुककर सब गम फ़ीके पड़ जाते हैं,

फिर क्यों तकिया सूखा रह जाए ऐसी कोई रात नहीं.

--- ' अतुल '

बचपन भटक जो जाते हैं


नन्हे हाथों में कांच के बर्तन चटक जो जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


घुल जाते मिसरी जैसे पानी में ,

गिर पड़ जाते हैं नादानी में ,

कंचों के खेल खेल जाते ,

कुछ कुछ दूर और ठेल जाते .


वोह खेल स्कूल से दूर किसी सड़क को जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


कुछ मुस्कान अभी थी बाकी ,

सपने सभी थे अभी तक साथी ,

किसी और दुनिया में चलते हर पग ,

बचपन के कांच से देखा था जग ,


उस दुनिया के उमंग महल तोह पलक झपक खो जाते हैं ,

खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .


- ' अतुल '

गज़ल

गज़ल

बिना समझे मुझे कहते हैं तुम्हें समझना है नामुमकिन ,
कोई एक मर्तबा ही सही कोशिश करके तो देखे.

हमदर्दी के काबिल तो समझा सबने, मुहब्बत के लायक नहीं,
कोई तसव्वुर में सही मुझे एक बार उस नज़र से तो देखे.

मेरी ज़िन्दगी हो बेमंजिल, मेरा जीना बेमतलब ही सही,
पर मेरा काम है मुश्किल, कोई रातभर आहें भर के तो देखे.

कौन कहता है नशा बस शराबी ही जाना करते हैं,
कोई जाए और किसी बेवफ़ा से मुहब्बत कर के तो देखे.

नासमझी नहीं कहते गैरत रखने वालों से मुहब्बत करने को,
क्या सुकून है बेहोशी में, वो होश किसी के नाम करके तो देखे.
--' अतुल '

Blog Flux

Poetry blogs