by Shirshendu Pandey
बाजारों की हलचल
ये बाजारों की हलचल है.
यहाँ पुराने हाथों से नए हुस्न की नुमाइश होती है,
ये बाजारों की हलचल है, कोई जिस्म नया बिकता होगा.
यहाँ सदियों के सूखे में गम ही बारिश बन कर गिरता है,
ये बाजारों की हलचल है, कोई बंजर ईमान ही सिंकता होगा.
यहाँ पुराने करतब कब से नए खिलाडी दिखाते हैं,
ये बाजारों की हलचल है, कोई पर्दा फिर से खिचता होगा.
यहाँ वो जंगल के जानवर आदमखोर तो खुल्ले घूमा करते है,
ये बाजारों की हलचल है, कोई इंसान पिंजडे में दिखता होगा.
यहाँ खनक और चमक पैगम्बर बोलने का हक रखते है,
ये बाजारों की हलचल है, कोई सिक्का पुराना घिसता होगा.
अरे! तुम क्या समझे, ये बाजारों की हलचल है.
- ' अतुल '
*
by Shirshendu Pandey
एक सवाल और उनके मुट्ठीभर जवाब
इस शहर के शोर में, ज़िन्दगी के हर मोड़ में,
भूल से या शायद याद से भूल जाते हैं,
एक सवाल और उनके मुट्ठीभर जवाब.
किसी खुदगर्जी से या किसी गर्म सियासत से,
पूंछते किसी ठंडी अंगीठी या सुलगती बगावत से,
एक सवाल और उनके मुट्ठीभर जवाब.
हिंदुस्तान-पाकिस्तान और सरहद की जंग में,
महल आलीशान में या गलियाँ गन्दी तंग में,
एक सवाल और उनके मुट्ठीभर जवाब.
जानते हैं एहसास से पर खोजते हैं किताब में,
गज़लकार के मुशायरे में, छलकी शराब में,
एक सवाल और उनके मुट्ठीभर जवाब.
एक सवाल - मैं कौन हूँ?
और इसके मुट्ठीभर गलत जवाब.
- ' अतुल '
*
by Shirshendu Pandey
ग़ज़ल
तुमने ये क्या कह दिया
मेरी ज़िन्दगी अभी थी बाकी और कुछ एहसास अनछुए से थे,
आह भी नहीं निकली बदन से तुमने धीरे से ये वार कैसा कर दिया.
सो गया था नींद गहरी बड़े अरसे से ये आँखें मेरी जागी ही थीं
अरे! प्यार की आड़ में किस ज़ख्म पर तुमने हाथ अपना रख दिया.
और धीरे से रोने को न कहना ये बड़ी ही ज्यादती हो जायेगी,
मैं हूँ अकेला, गूंजता हूँ, तू कौन है जो मेरे रोने से डर के चल दिया.
इतनी क़यामत है ज़िन्दगी की किसी का डर नहीं बाकी मुझमे,
मैं कच्चे खाक का बुत था, तुने प्यार से ख़ाक मुझको कर दिया.
ऐसी भी बेशर्मी के न कायल बनो, अजी खुदा सभी को देखता है,
खूब खेला मेरे आंसुओं से और जाने से पहले रुमाल पीछे रख दिया.
-- ' अतुल '
by Shirshendu Pandey
क्यों
इस शहर में डूबते जज्बात पूंछते हैं,
हर आदमी यहाँ इंसान क्यों नहीं होता.
मेरे पूछने से पहले ही ये दास्तान सुनाई गई,
इस मुलाकात का कोई अंजाम क्यों नहीं होता.
इतनी दौलत है यहाँ मंदिर मस्जिद में ,
फिर यहाँ नेकी करना आसान क्यों नहीं होता.
हवा वही है, मौसम वही है सदियों से यहाँ,
फिर सुकून से यहाँ कोई काम क्यों नहीं होता.
नेकी फौलाद का ईमान चाहती है, इसलाम नहीं,
अजी, हर बशर यहाँ मुसलमान क्यों नहीं होता.
-- ' अतुल '
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