by Shirshendu Pandey
दुआ
बस एक दुआ सुन ले मालिक बेआब रहूँ बर्बाद रहूँ.
ज़ख्म खा कर हसने को मैं ज़ुल्म बड़ा ही समझता हूँ,
मैं चीखके पुकार सकूं, मैं कमज़ोर रहूँ आज़ाद रहूँ.
हर फ़िक्र से मुझको लगता है जान अभी भी बाकी है,
मैं अब मरने के ही बाद जियूं, मरने के ही बाद रहूँ.
और ढूंढकर मारेंगे मेरे चाहनेवाले पत्थर मुझको,
बड़ा बदनाम है ये नाम मेरा, इसी नाम से सबको याद रहूँ.
मेरे टूटने की गुजारिश कईयों की ख्वाहिश है कबसे,
यूँ ही किसी की ख्वाहिश रहूँ, किसी दिल की फरियाद रहूँ.
--' अतुल '
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by Shirshendu Pandey
साँस है पर साज़ नहीं
इतनी सी ही तो बात है, साँस है पर साज़ नहीं,
एक गीत जुबां पर आता है, याद है पर याद नहीं.
बीते लोगों को भूल भी जाएँ, पर नज़रें राह तकती हैं,
कानों में मोहल्ले का शोर है, उनके क़दमों की आवाज़ नहीं.
जो बरकत में खेलते हैं लुक्का छुप्पी के खेलों को,
उनकी आँखों में राह कई हैं, पर राहों पर आँख नहीं.
हवा भी गिरकर सागर से कभी न कभी जा मिलती है,
पर खुदसे छुपते तुमसे हमको अपने मिलने की आस नहीं.
वक़्त के आगे सुना झुककर सब गम फ़ीके पड़ जाते हैं,
फिर क्यों तकिया सूखा रह जाए ऐसी कोई रात नहीं.
--- ' अतुल '
by Shirshendu Pandey
नन्हे हाथों में कांच के बर्तन चटक जो जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
घुल जाते मिसरी जैसे पानी में ,
गिर पड़ जाते हैं नादानी में ,
कंचों के खेल खेल जाते ,
कुछ कुछ दूर और ठेल जाते .
वोह खेल स्कूल से दूर किसी सड़क को जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
कुछ मुस्कान अभी थी बाकी ,
सपने सभी थे अभी तक साथी ,
किसी और दुनिया में चलते हर पग ,
बचपन के कांच से देखा था जग ,
उस दुनिया के उमंग महल तोह पलक झपक खो जाते हैं ,
खामोशी की राह से बचपन भटक जो जाते हैं .
- ' अतुल '