ग़ज़ल : इंसानों की भीड़ में


इंसानों की भीड़ में

इंसानों की भीड़ में मुझे न कहीं इंसान दिखे.

मुझे मंदिर दिखे, मस्जिद दिखे, हिन्दू दिखे, मुसलमान दिखे,
पर मस्जिद में अल्लाह न दिखे, मंदिर में न भगवान दिखे.

बिकते हुए सपने दिखे, बिकते हुए अरमान दिखे,
दुनिया के इस बाज़ार में लेकिन, फौलाद के न इमान दिखे.

टी वी दिखी, विडियो गेम्स दिखे, फिल्में दिखीं, शाहरुख़ खान दिखे,
चार साल के बच्चे भी अब मुझे न मासूम दिखे, न नादान दिखे.

परमाणु दिखे, नागासाकी दिखे, इराक और अफगानिस्तान दिखे,
मुझे सपने में दुनिया के नक्शे पर, न पाकिस्तान दिखे, न हिंदुस्तान दिखे.

--' अतुल '

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ग़ज़ल


ग़ज़ल

हर किसी से यहाँ धोखा ही मैंने खाया है,
कौन अपना है और कौन यहाँ पराया है.

ले चुके है साँसे अपने हिस्से की लगता है,
अब तो हर सांस का लगता नुझे किराया है.

मेरे आंसू यहाँ किसीको नहीं भिगो सकते,
बस महफिल में एक मुद्दा नया उठाया है.

कुछ पहले इसी भीड़ ने पैगम्बर मुझे कहा था,
कुछ पहले ही इन्होंने शैतान मुझे बताया है.

तेरे आगे सब झुकाते हैं मैं भी झुका देता हूँ,
पर सजदे में नहीं मैंने तो बेबसी में सर झुकाया है.

--- ' अतुल '

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चार कोस , पानी की खातिर


सावन ने अपनी कृपा से कृतार्थ कर दिया है. पानी की सुन्दर बुँदे जहाँ पृथ्वी को तृप्त करती प्रतीत होती हैं, वहीँ मेरे मन में अनायास ही एक सवाल उठा देती हैं. भारत में कुल चार सौ गाँव में पीने का पानी सुलभ नहीं है. और हजारों की संख्या में औरतें (ध्यान दें केवल औरतें ) मीलों चल कर पानी भर भर के लाती हैं. और हममे से कई लोग पानी की कीमत की खिल्ली प्रतिदिन अपने घरों में, अपनी सोसाइटी में उड़ते हैं. कैसी विडम्बना है. यदि आप पानी की कीमत पहचानते हैं तो ज़रा इस कविता को पढें. एक गृहणी अपने छोटे बच्चे को घर छोड़कर पानी के लिए मीलों चलकर, झुलसते हुए जाती है. यदि आपको न्यायाभाव प्रतीत हो तो पानी बचाएं. save water, save life. अफ्रीका में प्रतिदिन दो सौ लोग प्यास से मरते हैं! सोचिये!

चार कोस , पानी की खातिर

मुन्ने को रोता छोड़ आई,
चार कोस पानी की खातिर.

झुलस गई थी धरा भी तपकर,
सिंक चुके थे नंगे पाओं.
प्यास सताती प्यास के लिए,
पर लांग गई कितने ही गाँव.

फिर भी न लडखडाई,
चार कोस पानी की खातिर.

फिर जब लम्बी कतार देखी तो ,
हुआ व्याकुल तन मन प्यासा.
आज नीर की दो बूंद हो संभव,
धुंधली सी लगती आसा.

फिर भी डटकर कतार लगाई,
चार कोस पानी की खातिर.

अब मुर्झा गई तेरी काया,
मन में मुन्ने की पीडा सताती थी,
अब उतरा तो पानी कंठों से उसके,
पर अपनी सुविधा से भी लाज उसे आ जाती थी.

पर क्या करती; प्यास बुझाई
चार कोस पानी की खातिर.

--- ' अतुल '

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मैं सो जाऊँ तो


मैं सो जाऊँ तो

जो मैं सो जाऊं तो, कोई आहट हा होने देना,
थकी ज़िन्दगी की थकान है, ज़रा देर और सोने देना.

जो सुनना वीरानों में किसी मायूस की रुदाली,
मेरी तन्हाई न बांटना, बस यूँ ही अकेले रोने देना.

न खोजना मुझे किसी दिन, किसी निशानी के बहाने,
मेरी तस्वीर को मेज़ पर ही किसी किताब में खोने देना.

उठने देना उन उँगलियों को जो मेरी ओर उठेंगी,
दामन पर मेरे दाग पुराने हैं, वक़्त को वक़्त से धोने देना.

--- ' अतुल '

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