दुश्मनी निभाने लगी

इश्क की हर अदा, मुझको लुभाने लगी,
क्या कहें दिल्लगी दुश्मनी निभाने लगी |

बचाया हवाओं से तो, चिरागों को  हमने,
क्या करे जो लौ ही हमें जलाने लगी |

सोचा था मिटादेंगी, दूरियां  हसरतों को,
हर इक दूरी तुमसे ये बेकरारी बढाने लगी |

बेतहाशा फरेब तुमने, कई किये हों  मगर, 
तुम्हारी आँखें हमें सब सच बताने लगी ।

मैं तुम्हें नशे के, हर घूट में पीता रहा ,
तुम मुझे आंसू की हर बूँद में बहाने लगी ।

तेरे इत्र की खुशबू मेरे कुरते पे सजती थी,
वही खुशबु तुम मेरी कब्र पे सजाने लगी ।

'अतुल'

जाने का इंतज़ार

अब तो हवाओं में भी इज़हार है ,
क्यूँ  हमें जाने का इंतज़ार है ।

जिस वक़्त को दिल तकता था,
दिल उसी वक़्त का पहरेदार है ।

टूटी सुलगी रातें बड़ी लम्बी थी,
बड़ा छोटा सा ये इकरार है ।

हर ज़ख्म ने नफरत न की तुमसे,
ज़ख्मों को मरहम पे एतबार है ।

छोड़ कर अनकही सुन ले अनसुनी,
चाहना आसान है कहना दुश्वार है ।

बहुत छोटी है साँसों की ये लड़ी ,
जीने दे ये ज़िन्दगी बस एक बार है ।

'अतुल'

होश

होश आ ले तो सम्हल जायेंगे,
लोग बिछड़ेंगे नहीं बदल जायेंगे |

वक़्त हमको इतना तो सिखा देगा,
ठोकर आज की हम कल खायेंगे |

याद आएंगे हम किसी बहाने से,
किसी बहाने आंच देना जल जेयेंगे |

मेरी बेहयाई मेरी ताकत नहीं है,
मिलेंगी जो नज़रें तो गल जायेंगे |

दिल में बसा के रखने का क्या फायदा,
हम जो ज़िन्दगी से निकल जायेंगे|

' अतुल '



कव्वाली : छुपा रक्खा है

बहुत समय से शायरी नहीं कर पा रहा था | इस बार एक कव्वाली पेश कर रहा हूँ | किसी शायर की बेपनाह मुहब्बत का पैग़ाम है जो अभी तक दिल के किसी कोने मैं छुपा है | एक परिंदे की आज़ाद होने की जिरह को शब्दों में पिरो के इस तरह पेश करने का इरादा है कि मानो मुहब्बत दिल के पिंजरे को तोड़ कर आज़ाद उड़ना चाहती हो | बहुत वक़्त बाद लिख रहा हूँ| वैसे तो शायरी को जंग नहीं लगती पर खास के कोई बुनियादी गलती हो तो मुआफ़ कीजिएगा| लिखा है ...


मैंने सीने में बहुत प्यार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

मेरी साँसों में अभी खुशबु तेरी आती है ,
जाते हो जो तो जान मेरी  जाती है |
ख़ुशी मिलती है आजकल ये अश्क पीने में,
हर बार जो सैलाब उठते सीने में | 

है मुझे गम ये इक इज़हार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है|

मैं नज़रें उठाई तो तुने परदे किये मुझसे,
मेरा रब है तुही, मैंने सजदे किये तुझसे |
मेरी नफरत में भी मुहब्बत अभी बाकी है,
ये वो प्यार है जो जाते नहीं जाती है |

मैंने दुनिया से तुझे हर बार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

तू न माने, न मानने के कई बहाने हैं,
बेवफाई और बेरुखी न तुझे आने हैं|
जो भी कहले तेरी आँखें तो बयां कर देंगी,
हवाएँ ये पतझड़ भी जवान कर देंगी |

तू है मेरी, तूने ये इख्तियार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

'अतुल'


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