कव्वाली : छुपा रक्खा है

बहुत समय से शायरी नहीं कर पा रहा था | इस बार एक कव्वाली पेश कर रहा हूँ | किसी शायर की बेपनाह मुहब्बत का पैग़ाम है जो अभी तक दिल के किसी कोने मैं छुपा है | एक परिंदे की आज़ाद होने की जिरह को शब्दों में पिरो के इस तरह पेश करने का इरादा है कि मानो मुहब्बत दिल के पिंजरे को तोड़ कर आज़ाद उड़ना चाहती हो | बहुत वक़्त बाद लिख रहा हूँ| वैसे तो शायरी को जंग नहीं लगती पर खास के कोई बुनियादी गलती हो तो मुआफ़ कीजिएगा| लिखा है ...


मैंने सीने में बहुत प्यार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

मेरी साँसों में अभी खुशबु तेरी आती है ,
जाते हो जो तो जान मेरी  जाती है |
ख़ुशी मिलती है आजकल ये अश्क पीने में,
हर बार जो सैलाब उठते सीने में | 

है मुझे गम ये इक इज़हार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है|

मैं नज़रें उठाई तो तुने परदे किये मुझसे,
मेरा रब है तुही, मैंने सजदे किये तुझसे |
मेरी नफरत में भी मुहब्बत अभी बाकी है,
ये वो प्यार है जो जाते नहीं जाती है |

मैंने दुनिया से तुझे हर बार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

तू न माने, न मानने के कई बहाने हैं,
बेवफाई और बेरुखी न तुझे आने हैं|
जो भी कहले तेरी आँखें तो बयां कर देंगी,
हवाएँ ये पतझड़ भी जवान कर देंगी |

तू है मेरी, तूने ये इख्तियार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

'अतुल'


ग़ज़ल: ठहर जाइये

अभी हौसला है, चले आइये ,
अभी जाँ है बाकी ठहर जाइये |

मुहब्बत को जितना भी नासूर समझो,
ये ज़ख्म है मीठा कुरेदे जाइये |

बहुत सी वफ़ा है आँखों में मेरी,
हर खता की सज़ा मुझको दे जाइये |

बहारों को भी इतना गुमाँ न होगा,
आये हैं तो ज़रा देर रुक जाइये |

शमा है अधूरी मैं आधा जला हूँ,
धीरे धीरे हमको जलाते जाइये |

नहीं जानता बिन तेरे मैं क्या हूँ,
मेरे बिन तू क्या है ये फरमाइए |

'अतुल'


नज़्म : कान सुनते नहीं

टूटे हैं कबसे हम, क्यूँ बिखरते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

नस में है नशा घुल रहा कि ज़हर,
काम आती न दुआ बुझ रही है नज़र |

अश्क बहते हैं, आंसू निकलते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

मैं अकेले चला हूँ, ये है मेरा रास्ता,
पीछे आना नहीं, तुमको है वास्ता |

राह दिखती मगर कांटे दिखते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

वो खफा हैं, जता के ख़ुशी तो मिली,
कुछ न खला, ये बेबसी तो खली |

मुस्कराहट है लबों पे, घाव छिपते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं | 

'अतुल ' 

ग़ज़ल : गम न होता

शायद तेरी बेवफाई का हमें इतना गम न होता,
अगर दिल में सैलाब मुहब्बत से कम न होता |

बहुत सी करवटें तेरे बिस्तर में अरमान लेते मेरे,
तेरी चादर से बड़ा अगर दिल का वहम न होता |

कुछ दिख जाती दरारें भी रिश्तों की दीवारों में,
अगर इस बारिश को दीवारों पे रहम न होता |

न किस्सा सुनाना किसीको, हसेंगे तुमपे मेरी जां,
ये किस्सा नहीं ये हादसा है जो ख़तम न होता |

चले जाओ भले रुकने से अब क्या फ़ायदा होगा,
हर घाव भरने के लिए वक़्त का मरहम न होता |

'अतुल'

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