ग़ज़ल: साये


तमन्ना की महफ़िल में मुझे खजाने मिलने लगे,
थोड़ी सी छाँव में भी यहाँ साये सभी पलने लगे|

दो वक़्त का मुद्दा उठाया था बस नाम के लिए,
भरी बारिश में कोरे कागज़ सबके जलने लगे|

छोटी सी नसीहत से डराया सबने बेतहाशा हमें,
सुबह की धुप में ही हम मोम से पिघलने लगे|

मेरी बुराइयों पर था कोसा मुझे हर इक बात पर,
मेरे ठन्डे होते ही देखो  हाथ सब मलने लगे|

अभी है नाज़ुक नब्ज़ मेरी थामना तुम गौर से,
ये क्या तुम तो  बस कफन छोड़कर चलने लगे|

- 'अतुल'

नज़्म : नहीं आता

मजबूर हूँ मैं कितना, कहना नहीं आता |
तेरी ही तरह मैं भी हूँ, रहना नहीं आता |

मैं बंदिशों से लड़ रहा हूँ, तूने जंजीरें तोड़ दीं |
मुहब्बत के पंछी को अकेले, उड़ना नहीं आता |

तू छोड़ चला मुझको, सूरज सा बढ़ गया |
मैं तालाब का पानी हूँ, बढ़ना नहीं आता |

ज़माने से भी लड़ गया जो मेरे आगे अड़ा |
अब तू लड़ा है, तुझसे लड़ना नहीं आता |

नासूर हूँ दिल का, मारोगे तो जी जाऊंगा |
कर मुहब्बत से क़त्ल मुझे, मरना नहीं आता |

ले चल मुझे तू जहाँ जाने से सुकून मिले |
कास के पकड़ना मुझे मुड़ना नहीं आता |

'अतुल'




  

नज़्म

बहुत दर्द है दिल में आज साज़ नहीं, 
ये मेरी आह है दिल की, आवाज़  नहीं|

छोटी सी थी कहानी जो सुना न सके,
कभी खबर न थी तुझे कभी हालात नहीं|

क्या कहूं मैं ये कहना है बड़ा मुश्किल,
तू जो पूछे तो बस कहूं कि कोई बात नहीं|

तू जानता है सब पर खामोश क्यूँ है,
मेरी जान जा रही है, तुझे एहसास नहीं|

ठोकर मिले ज़माने से तो क्या मुझको,
मैं हूँ तेरा, इस में कोई भी राज़ नहीं| 

इतना बड़ा दिल है तेरा, फिर ज्यादती क्यूँ,
जीने को पल दिए पर मिलने को मुलाक़ात नहीं|

है क्या डर तुझे, ये कह दे तू मुझसे,
सूरज दिए को, इश्क़ इकरार को मोहताज नहीं|

ये ग़ज़ल है तेरी बस लिखता हूँ मैं,
मेरे लब हैं पर इनमे मेरे अलफ़ाज़  नहीं|

'अतुल'  

नज़्म : गुडिया की कहानी

एक छोटी सी गुडिया की कहानी कहो तो सुनाऊं,
पलकों में रहती थी रह रह के मुझे सताती थी |

बाँहों में गुलदस्ते लपेटे खुशबु सी लगती कभी,
कभी कानों में मेरे फिज़ा का दर्द गुनगुनाती थी |

क्या राज़ है, किसको पता दबी सी मुस्कान के पीछे,
या वही बात है जो वो तसव्वुर में आके बताती थी|

मचल उठती थी प्याले में बंधे नशे की तरह,
कभी मोती के कीमती टुकड़े अश्कों से बहती थी|

उसका आशियाँ था मेरे दिल का हर कोना,
मेरे आगोश में, मेरी मुहब्बत में हर शाम नहाती थी|

मेरी पलकों की चादर ओढ़ कर सोती थी बेहोश सी,
हर रात हकीकत से लड़कर मेरे आगोश में समाती थी|

'अतुल'

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