by Shirshendu Pandey
इस शहर का तो लगता यही दस्तूर है,
यहाँ मुहब्बत को इबादत नहीं कहते.
परछाई बनकर देखो कि जीना क्या है,
मेरे होने को यहाँ हकीकत नहीं कहते.
यहाँ ज़माने से लड़ना बगावत है,
मुहब्बत में मिटने को शहादत नहीं कहते.
महबूब यहाँ बिछने को कालीन होते हैं,
खूब है यहाँ महबूब को हसरत नहीं कहते.
किसी की चोट पर जान निकलती है,
इस मर्ज़ को यहाँ मुहब्बत नहीं कहते.
मेरे सीने के घाव उनके तोहफे ही हैं,
उनके किसी वार को हम नफरत नहीं कहते.
- "अतुल"
by Shirshendu Pandey
अभी इतनी सी तो उम्मीद है कि,
कम से कम तेरे गुलशन तो आबाद हैं.
थोडा सा सावन कितना बरसता,
पर आँखें अभी भी बरसने को आज़ाद हैं.
मेरे घर और उनके घर का नाता है कुछ,
दुनिया तो दोनों तरफ ही बर्बाद है.
थोड़ी सी हलचल थी मेरे घर में,
थोडा उनके भी घर में फसाद है.
ठोकर ज़मीन पर खाते रहे,
अपनी हालत तो हमेशा से ही ख़राब है.
पहले हाथों में गुलाब था,
आज कल हाथों में शराब है.
मेरी हर बात बोरियत होती है,
अच्छा है कि उनकी अलग हर बात है.
मेरी आँखों में जो अश्क कमजोरी कहलाए,
वोह उनकी आँखों में जज़्बात है.
शुक्रिया
'अतुल'
by Shirshendu Pandey
दस्तक है, कोई आने को है.
वो शहर यहाँ उजड़ा था कभी,
वहीं कोई बस्ती बसाने को है.
मैं ही था राह में ताकता ही रहा,
राह वहीँ से मुड जाने को है.
तोड़ हर कसम, आज उनके पास,
कोई वायदा निभाने को है.
हद से जियादा मांग लिया आपने,
मेरा सब्र शायद टूट जाने को है.
' अतुल '
by Shirshendu Pandey
मैं कभी कभी सोचता हूँ कि समाज हमारे लिए दायरे किस हद तक बना सकता है. वो क्या सीमा है जहाँ हम समाज को ये हक से कह संकें कि इसके आगे आप को नहीं दखल देना चाहिए. और हर बार मैं यही समझ पाया कि या तो समाज को दखल देने का हक है या फिर नहीं ही है; ऐसी कोई हद नहीं हों सकती जो समाज और एक व्यक्ति की सीमाएं तय कर संकें. इसी असमंजस में एक नज़्म लिख रहा हूँ. सुनिए..
वहां भी तुम्हारी सुनकर,
कोई रोया फूट-फूट कर.
यहाँ भी कोई लड़कर,
टूटा आखिर जूझ-जूझ कर.
तमाशा ताकें आँखें मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.
तेरी हर एक बात सुनी,
पर ये मेरी दहलीज़ है,
झूठे अंधे कानून सुने,
जज़्बात भी सभी नाचीज़ हैं.
चीत्कारों के बीच में है एक चीख मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.
ज़ख़्मी जानवर के लिए भी
उनको तड़पते देखा मैंने.
इंसान के लिए नफरत से,
बस इतना ही सीखा मैंने.
यहाँ दफ़न लाशों में एक लाश है मेरी भी,
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.
बहुत रूठकर भी मैं यही कह पाया,
बुस्दिली में है एक आवाज़ मेरी भी.
तू जीता, मैं लांग न पाया,
इस दायरे में है फिर भी, एक दुनिया मेरी भी.
आखिर थोड़ी दुनिया मेरी भी.
' अतुल '