इल्तिजा

इक इल्तिजा करता हूँ, मुझे कोई याद न करे,
मेरी चाहत कोई कभी, मेरे जाने के बाद न करे |

इतना ही जीता हूँ के हर ख़ुशी मिलती हमें,
मेरे गम में आंसू दिल के कोई बर्बाद न करे |

जज़्बात हमें सरे आम ज़लील करने लगे हैं,
दिल से इन्हें कोई गलती से आज़ाद न करे |

मेरे दिल के टुकड़े तेरी राह पर बिखरें ज़रूर,
है कसम तुझे चुभे कभी तो तू फरियाद न करे |

तू चाहे न माने पर ऐसा हुआ नहीं कभी कि,
मैं आँखें मूंदूं और दिल तुझे फरियाद न करे |

- 'अतुल' 

ग़ज़ल : मांग लें

तेरी बेवफाई के बदले क्यूँ न बेखुदी मांग लें,
ज़िन्दगी मुबारक तुझे, हम ख़ुदकुशी मांग लें |

तोड़ दे तू दिल हजारों, गुल बिखरादे तू कई,
चल के उनपे कांटो से ही, हम हर ख़ुशी मांग लें |

तेरी महफ़िल न मिली तो सावन भी आया नहीं,
सोचता हूँ थोड़ी मुहब्बत, पतझड़ से ही मांग लें |   

तेरा सर था मेरे कंधे, दिल किसी की बांह में,
ख्याल आया फिर, क्यूँ न तेरी दोस्ती मांग लें |

मेरी मय्यत पे तशरीफ़ जो लाये तो सोचा,
खुदा से हम काफिर क्यूँ न, ज़िन्दगी मांग लें |

- 'अतुल'




ग़ज़ल: साये


तमन्ना की महफ़िल में मुझे खजाने मिलने लगे,
थोड़ी सी छाँव में भी यहाँ साये सभी पलने लगे|

दो वक़्त का मुद्दा उठाया था बस नाम के लिए,
भरी बारिश में कोरे कागज़ सबके जलने लगे|

छोटी सी नसीहत से डराया सबने बेतहाशा हमें,
सुबह की धुप में ही हम मोम से पिघलने लगे|

मेरी बुराइयों पर था कोसा मुझे हर इक बात पर,
मेरे ठन्डे होते ही देखो  हाथ सब मलने लगे|

अभी है नाज़ुक नब्ज़ मेरी थामना तुम गौर से,
ये क्या तुम तो  बस कफन छोड़कर चलने लगे|

- 'अतुल'

नज़्म : नहीं आता

मजबूर हूँ मैं कितना, कहना नहीं आता |
तेरी ही तरह मैं भी हूँ, रहना नहीं आता |

मैं बंदिशों से लड़ रहा हूँ, तूने जंजीरें तोड़ दीं |
मुहब्बत के पंछी को अकेले, उड़ना नहीं आता |

तू छोड़ चला मुझको, सूरज सा बढ़ गया |
मैं तालाब का पानी हूँ, बढ़ना नहीं आता |

ज़माने से भी लड़ गया जो मेरे आगे अड़ा |
अब तू लड़ा है, तुझसे लड़ना नहीं आता |

नासूर हूँ दिल का, मारोगे तो जी जाऊंगा |
कर मुहब्बत से क़त्ल मुझे, मरना नहीं आता |

ले चल मुझे तू जहाँ जाने से सुकून मिले |
कास के पकड़ना मुझे मुड़ना नहीं आता |

'अतुल'




  

Blog Flux

Poetry blogs