शायरी : एक सवाल देदो

मैं अंधेरों से लड़ता हूँ कोई मुझे मशाल देदो,
पूंछता हूँ मैं बेजुबान की तरह, एक सवाल देदो.

हकीकत गिरवी रक्खी मैंने मुहब्बत की सेज पर,
तमाशा हूँ बना मैं हर ओहदे वाले की मेज़ पर.

आवारगी और आशिकी की हद किसने पहचानी है,
कब्र से कब्र है जिस तरह, इंसानियत अनजानी है.

सहारा बनकर ज़िन्दगी देना उनकी हमदर्दी थी,
ये मानना मेरी सज़ा, न मानना मेरी खुदगर्जी थी.

मेरी हालत पे रहम हो तो होश थोडा उधार देदे,
मेरी बीमार हसरत को थोड़ी दवा इक बार देदे.

एक आंसू तो बहालूँ, मुझे अपना रुमाल देदो,
उसके बाद हर मौसम भले, मुझे बदहाल देदो.

आपकी शाबाशी के कायल हैं हम, आपसे गुजारिश है कि अपने ख्यालों से मुझे अवगत कराएँ. पढने का बहुत बहुत शुक्रिया. धन्यवाद्.

                                  'अतुल'

ग़ज़ल : चश्मदीद है आसमान

आज एक सच्ची  मुहब्बत का अफसाना बयान कर रहा हूँ . सुनिए .. लिखता हूँ,

मैं तो हूँ तेरी दुनिया, तू ही है मेरा जहाँ,
रास्ते हैं सारे गवाह, चश्मदीद है आसमान.

*                           *                               *

मैं जो पुकारूं तुझको, और बड़े हों फासले,
आँख भरके याद करना, सज उठेंगे काफिले.

इंतज़ार के दिए जब हवाओं में डगमगायेंगे,
हम आंसुओं से रात भर नैनों के दीप जलायेंगे.

रो रो थकेगा सावन, भादो होगा परेशान,
हर हाल में जारी रहेगा मुहब्बत का कारवां.

*                             *                              *

होगा एक दिन यूँ, तुम हमें भूल जाओगे,
रास्ते होंगे हज़ारों,  दूर कहीं निकल जाओगे.

तनहाइयों में तुम, अंधेरों में मचल जाओगे,
दिल कहेगा लौट जाओ, पर लौट न पाओगे.

याद करना उस पल, हम पहुँच जायेंगे वहाँ,
खून से सींचेंगे फूल, तेरे आंसू गिरेंगे जहाँ.

*                             *                               *

गर उसी राह पर कोई और दूजा मिल जाए,
हम नज़रों से हों दूर और वफ़ा हिल जाए.

लगे महफ़िल कहीं और टकराएं शीशे जाम के,
साथ न हों मेरा तो चलना किसीका हाथ थाम के.

गैरों से न दर्द लेना, भूल जाना हम मिले कहाँ,
भूल जाना सर्द मौसम और अपनी दास्तान.

*                                *                             *

हम तो चलेंगे अकेले, आँखों में ले तेरा जहाँ,
तू बेशक भुलादे, हम रखेंगे पाक मुहब्बत जवाँ.
रास्ते रहेंगे गवाह, चश्मदीद रहेगा आसमान.
चश्मदीद रहेगा ये आसमान.


पढने का तहे दिल से शुक्रिया.

ग़ज़ल : खुद के बारे में

 खुद के बारे में लिखना कभी आसान नहीं होता. पर कभी कभार लिखना ज़रूरी होता है. ये सोचने का मौका मिलता है कि हम कैसे हैं. ये विश्लेषण ज़रूरी है. कुछ अपने बारे में लिख रहा हूँ.----


अफसाना बयाँ करते हैं तो कभी रात नहीं होती,
महफ़िल में मिलते हैं सबसे पर मुलाक़ात नहीं होती.

मेरी शक्सियत है ऐसी ही बुरा न मानें, गलती होगी,
यारों से भी मेरी आज कल खुलके बात नहीं होती.

मुझे जानना है मुसीबत, नसीहत लें तो बचियेगा,
मेरी दास्तान है दिलचस्प पर जलसे में आवाज़ नहीं होती.

हम वो हैं जिसकी मौत ही बेवफा निकली हमेशा ही,
हमसे तो अब ज़िन्दगी भी कभी नाराज़ नहीं होती.

फ़िदा होना वो खूबी है जो अरसे से हमको सिखाई गई,
आदत है बुरी, पर खता करने से फितरत बाज़ नहीं होती.

'अतुल' 

ग़ज़ल : मेरे हसने पे न जाना

तकलीफ कोई न कोई, हर किसी को होती ही है. कोई झट से आंसू बहा देता है तो कोई उस लम्हे का इंतज़ार करता है जब अश्क सारे दायरे तोड़ कर नज़रों को भिगो देते हैं. कोई हस कर छिपाता है तो कोई ख़ामोशी कि जुबान से धीरे से कुछ कह देता है. कितनी अजीब बात है कि दर्द की अभिव्यक्ति कितनी भिन्न होती है.

मेरे हसने पे न जाना मैंने रोना नहीं सीखा है,
मेरी आँखें नहीं नम तो क्या, दामन मेरा भीगा है.

कहते हैं के आंसू दिल का भार कम करते हैं, पर हर दिन हर रात रो कर भी ऐसा लगता है कि दरिया भी बहा दो तो नज़रों को कम पड़ेगा. और बात तो ये भी है कि कितनी ही मर्तबा मेरे रोने पे आंसुओं ने मुझे धोखा दिया. क्या बिना आंसुओं के गम नहीं छलकता?

ये समझ नहीं आया कि आंसूं नेक हैं कि नहीं,
इन्हें देख कर ही लोगों का दिल आज पसीजा है.

सबूत ढूंढते हैं कि निगाहों में है जलन कि नहीं,
तहकिकात न करें, अश्कों का रास्ता बड़ा सीधा है.


दिल से निकलकर, आँखों से गिरती हैं जो बूँदें,
उनका होता किसी दिल पर बड़ा नतीजा है.


पर उनका क्या जो हसते होठों में छुपते हैं,
अनसुनी सिसकियों ने बस तनहाइयों में चीखा है.

सच तो हमेशा की ही तरह धुंधला है, पर हर रोने वाले की हकीकत यही होती है. मैं मानता हूँ कि तकलीफ में रो पाना कितनी खुशकिस्मतों की खूबी होती है. और कितना तकलीफ देता है गम के कडवे एहसास को बिना सिसकी भरे मुस्कुरा के दिल में समेट लेना. कितना ज़रूरी है हर चाहने वाले के लिए ये जान पाना कि दर्द जो न जुबां पर आ पता है और न ही आँखों में वो दिल में कैसा कोहराम मचाता है. ये खुद पर किया गुनाह बड़ा ही गलत है. इसका इलाज अगली ग़ज़ल में ढूढने की कोशिश करूंगा.

पढने का शुक्रिया.

आपका अतुल.

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