ये कौन घाट है



बुझती नहीं न  थमती ये  कैसी प्यास है,
ये कौन सा पानी है, ये कौन घाट है |

तूने क्या सोचा बन्दे, कब तक रहेगा बंधन, 
कब तकेंगी अखियाँ, कब तक रहेगा सावन|
थामा क्या तूने दामन, छूटा  किसका हाथ है,
ये कौन सा पानी है, ये कौन घाट है |

रहने दे झूठे किस्से, मुझको क्या झुठलाता है,
मैं हूँ आइना तेरा, मुझे क्या शर्माता है |
बुझी सुबह है बाहर. अन्दर सुलगती रात है,
ये कौन सा पानी है, ये कौन घाट है |

दिल है बहल जायेगा, कोई फिर से मिल जायेगा
घाव ही है भर जायेगा, ज़ख्म हर इक सिल जायेगा|
समझे है प्रेम तू पर पल दो पल का साथ है,
ये कौन सा पानी है, ये कौन घाट है |

राही सोचे घाट है, कुछ  देर रुक जाना है,
पानी बहने को चला है, लेहेरों को टकराना है|
बीता जो पल तो संग क्या, बीती हर बात है,
भूल जा रही ये कि, कौन सा ये घाट है|

- 'अतुल'

दुश्मनी निभाने लगी

इश्क की हर अदा, मुझको लुभाने लगी,
क्या कहें दिल्लगी दुश्मनी निभाने लगी |

बचाया हवाओं से तो, चिरागों को  हमने,
क्या करे जो लौ ही हमें जलाने लगी |

सोचा था मिटादेंगी, दूरियां  हसरतों को,
हर इक दूरी तुमसे ये बेकरारी बढाने लगी |

बेतहाशा फरेब तुमने, कई किये हों  मगर, 
तुम्हारी आँखें हमें सब सच बताने लगी ।

मैं तुम्हें नशे के, हर घूट में पीता रहा ,
तुम मुझे आंसू की हर बूँद में बहाने लगी ।

तेरे इत्र की खुशबू मेरे कुरते पे सजती थी,
वही खुशबु तुम मेरी कब्र पे सजाने लगी ।

'अतुल'

जाने का इंतज़ार

अब तो हवाओं में भी इज़हार है ,
क्यूँ  हमें जाने का इंतज़ार है ।

जिस वक़्त को दिल तकता था,
दिल उसी वक़्त का पहरेदार है ।

टूटी सुलगी रातें बड़ी लम्बी थी,
बड़ा छोटा सा ये इकरार है ।

हर ज़ख्म ने नफरत न की तुमसे,
ज़ख्मों को मरहम पे एतबार है ।

छोड़ कर अनकही सुन ले अनसुनी,
चाहना आसान है कहना दुश्वार है ।

बहुत छोटी है साँसों की ये लड़ी ,
जीने दे ये ज़िन्दगी बस एक बार है ।

'अतुल'

होश

होश आ ले तो सम्हल जायेंगे,
लोग बिछड़ेंगे नहीं बदल जायेंगे |

वक़्त हमको इतना तो सिखा देगा,
ठोकर आज की हम कल खायेंगे |

याद आएंगे हम किसी बहाने से,
किसी बहाने आंच देना जल जेयेंगे |

मेरी बेहयाई मेरी ताकत नहीं है,
मिलेंगी जो नज़रें तो गल जायेंगे |

दिल में बसा के रखने का क्या फायदा,
हम जो ज़िन्दगी से निकल जायेंगे|

' अतुल '



कव्वाली : छुपा रक्खा है

बहुत समय से शायरी नहीं कर पा रहा था | इस बार एक कव्वाली पेश कर रहा हूँ | किसी शायर की बेपनाह मुहब्बत का पैग़ाम है जो अभी तक दिल के किसी कोने मैं छुपा है | एक परिंदे की आज़ाद होने की जिरह को शब्दों में पिरो के इस तरह पेश करने का इरादा है कि मानो मुहब्बत दिल के पिंजरे को तोड़ कर आज़ाद उड़ना चाहती हो | बहुत वक़्त बाद लिख रहा हूँ| वैसे तो शायरी को जंग नहीं लगती पर खास के कोई बुनियादी गलती हो तो मुआफ़ कीजिएगा| लिखा है ...


मैंने सीने में बहुत प्यार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

मेरी साँसों में अभी खुशबु तेरी आती है ,
जाते हो जो तो जान मेरी  जाती है |
ख़ुशी मिलती है आजकल ये अश्क पीने में,
हर बार जो सैलाब उठते सीने में | 

है मुझे गम ये इक इज़हार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है|

मैं नज़रें उठाई तो तुने परदे किये मुझसे,
मेरा रब है तुही, मैंने सजदे किये तुझसे |
मेरी नफरत में भी मुहब्बत अभी बाकी है,
ये वो प्यार है जो जाते नहीं जाती है |

मैंने दुनिया से तुझे हर बार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

तू न माने, न मानने के कई बहाने हैं,
बेवफाई और बेरुखी न तुझे आने हैं|
जो भी कहले तेरी आँखें तो बयां कर देंगी,
हवाएँ ये पतझड़ भी जवान कर देंगी |

तू है मेरी, तूने ये इख्तियार छुपा रक्खा है,
कोई आशिक कोई दिलदार छुपा रक्खा है |

'अतुल'


ग़ज़ल: ठहर जाइये

अभी हौसला है, चले आइये ,
अभी जाँ है बाकी ठहर जाइये |

मुहब्बत को जितना भी नासूर समझो,
ये ज़ख्म है मीठा कुरेदे जाइये |

बहुत सी वफ़ा है आँखों में मेरी,
हर खता की सज़ा मुझको दे जाइये |

बहारों को भी इतना गुमाँ न होगा,
आये हैं तो ज़रा देर रुक जाइये |

शमा है अधूरी मैं आधा जला हूँ,
धीरे धीरे हमको जलाते जाइये |

नहीं जानता बिन तेरे मैं क्या हूँ,
मेरे बिन तू क्या है ये फरमाइए |

'अतुल'


नज़्म : कान सुनते नहीं

टूटे हैं कबसे हम, क्यूँ बिखरते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

नस में है नशा घुल रहा कि ज़हर,
काम आती न दुआ बुझ रही है नज़र |

अश्क बहते हैं, आंसू निकलते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

मैं अकेले चला हूँ, ये है मेरा रास्ता,
पीछे आना नहीं, तुमको है वास्ता |

राह दिखती मगर कांटे दिखते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं |

वो खफा हैं, जता के ख़ुशी तो मिली,
कुछ न खला, ये बेबसी तो खली |

मुस्कराहट है लबों पे, घाव छिपते नहीं,
चीख है तो दीवारों में, कान सुनते नहीं | 

'अतुल ' 

ग़ज़ल : गम न होता

शायद तेरी बेवफाई का हमें इतना गम न होता,
अगर दिल में सैलाब मुहब्बत से कम न होता |

बहुत सी करवटें तेरे बिस्तर में अरमान लेते मेरे,
तेरी चादर से बड़ा अगर दिल का वहम न होता |

कुछ दिख जाती दरारें भी रिश्तों की दीवारों में,
अगर इस बारिश को दीवारों पे रहम न होता |

न किस्सा सुनाना किसीको, हसेंगे तुमपे मेरी जां,
ये किस्सा नहीं ये हादसा है जो ख़तम न होता |

चले जाओ भले रुकने से अब क्या फ़ायदा होगा,
हर घाव भरने के लिए वक़्त का मरहम न होता |

'अतुल'

कब तक इंतज़ार

शाम ढली अब क्या जतन हर बार करे,
दिल कमज़ोर है, कब तक इंतज़ार करे |

धागे रिश्तों के कमज़ोर हैं ये जानते हैं,
जो ये घाव सिये तो अंग भी बेकार करे |

उठा के सपनों का बोझ पलकों पे चले,
गिरे तो खुदको, रहे तो चलना दुश्वार करे |

सोचा बहुत कि मंजिल के आगे बढ़ जाएँ,
ये दिल है  नादाँ, हर मंजिल पे प्यार करे |

नदी चली आती है आगे थोड़ी बावफा है,
कटे घुले भले पर आखिर क्या कगार करे |

छोड़ भला क्या और बुरा क्या होना है,
जंग है दिल की, ये जीते को भी हार करे |

'अतुल'

इल्तिजा

इक इल्तिजा करता हूँ, मुझे कोई याद न करे,
मेरी चाहत कोई कभी, मेरे जाने के बाद न करे |

इतना ही जीता हूँ के हर ख़ुशी मिलती हमें,
मेरे गम में आंसू दिल के कोई बर्बाद न करे |

जज़्बात हमें सरे आम ज़लील करने लगे हैं,
दिल से इन्हें कोई गलती से आज़ाद न करे |

मेरे दिल के टुकड़े तेरी राह पर बिखरें ज़रूर,
है कसम तुझे चुभे कभी तो तू फरियाद न करे |

तू चाहे न माने पर ऐसा हुआ नहीं कभी कि,
मैं आँखें मूंदूं और दिल तुझे फरियाद न करे |

- 'अतुल' 

ग़ज़ल : मांग लें

तेरी बेवफाई के बदले क्यूँ न बेखुदी मांग लें,
ज़िन्दगी मुबारक तुझे, हम ख़ुदकुशी मांग लें |

तोड़ दे तू दिल हजारों, गुल बिखरादे तू कई,
चल के उनपे कांटो से ही, हम हर ख़ुशी मांग लें |

तेरी महफ़िल न मिली तो सावन भी आया नहीं,
सोचता हूँ थोड़ी मुहब्बत, पतझड़ से ही मांग लें |   

तेरा सर था मेरे कंधे, दिल किसी की बांह में,
ख्याल आया फिर, क्यूँ न तेरी दोस्ती मांग लें |

मेरी मय्यत पे तशरीफ़ जो लाये तो सोचा,
खुदा से हम काफिर क्यूँ न, ज़िन्दगी मांग लें |

- 'अतुल'




ग़ज़ल: साये


तमन्ना की महफ़िल में मुझे खजाने मिलने लगे,
थोड़ी सी छाँव में भी यहाँ साये सभी पलने लगे|

दो वक़्त का मुद्दा उठाया था बस नाम के लिए,
भरी बारिश में कोरे कागज़ सबके जलने लगे|

छोटी सी नसीहत से डराया सबने बेतहाशा हमें,
सुबह की धुप में ही हम मोम से पिघलने लगे|

मेरी बुराइयों पर था कोसा मुझे हर इक बात पर,
मेरे ठन्डे होते ही देखो  हाथ सब मलने लगे|

अभी है नाज़ुक नब्ज़ मेरी थामना तुम गौर से,
ये क्या तुम तो  बस कफन छोड़कर चलने लगे|

- 'अतुल'

नज़्म : नहीं आता

मजबूर हूँ मैं कितना, कहना नहीं आता |
तेरी ही तरह मैं भी हूँ, रहना नहीं आता |

मैं बंदिशों से लड़ रहा हूँ, तूने जंजीरें तोड़ दीं |
मुहब्बत के पंछी को अकेले, उड़ना नहीं आता |

तू छोड़ चला मुझको, सूरज सा बढ़ गया |
मैं तालाब का पानी हूँ, बढ़ना नहीं आता |

ज़माने से भी लड़ गया जो मेरे आगे अड़ा |
अब तू लड़ा है, तुझसे लड़ना नहीं आता |

नासूर हूँ दिल का, मारोगे तो जी जाऊंगा |
कर मुहब्बत से क़त्ल मुझे, मरना नहीं आता |

ले चल मुझे तू जहाँ जाने से सुकून मिले |
कास के पकड़ना मुझे मुड़ना नहीं आता |

'अतुल'




  

नज़्म

बहुत दर्द है दिल में आज साज़ नहीं, 
ये मेरी आह है दिल की, आवाज़  नहीं|

छोटी सी थी कहानी जो सुना न सके,
कभी खबर न थी तुझे कभी हालात नहीं|

क्या कहूं मैं ये कहना है बड़ा मुश्किल,
तू जो पूछे तो बस कहूं कि कोई बात नहीं|

तू जानता है सब पर खामोश क्यूँ है,
मेरी जान जा रही है, तुझे एहसास नहीं|

ठोकर मिले ज़माने से तो क्या मुझको,
मैं हूँ तेरा, इस में कोई भी राज़ नहीं| 

इतना बड़ा दिल है तेरा, फिर ज्यादती क्यूँ,
जीने को पल दिए पर मिलने को मुलाक़ात नहीं|

है क्या डर तुझे, ये कह दे तू मुझसे,
सूरज दिए को, इश्क़ इकरार को मोहताज नहीं|

ये ग़ज़ल है तेरी बस लिखता हूँ मैं,
मेरे लब हैं पर इनमे मेरे अलफ़ाज़  नहीं|

'अतुल'  

नज़्म : गुडिया की कहानी

एक छोटी सी गुडिया की कहानी कहो तो सुनाऊं,
पलकों में रहती थी रह रह के मुझे सताती थी |

बाँहों में गुलदस्ते लपेटे खुशबु सी लगती कभी,
कभी कानों में मेरे फिज़ा का दर्द गुनगुनाती थी |

क्या राज़ है, किसको पता दबी सी मुस्कान के पीछे,
या वही बात है जो वो तसव्वुर में आके बताती थी|

मचल उठती थी प्याले में बंधे नशे की तरह,
कभी मोती के कीमती टुकड़े अश्कों से बहती थी|

उसका आशियाँ था मेरे दिल का हर कोना,
मेरे आगोश में, मेरी मुहब्बत में हर शाम नहाती थी|

मेरी पलकों की चादर ओढ़ कर सोती थी बेहोश सी,
हर रात हकीकत से लड़कर मेरे आगोश में समाती थी|

'अतुल'

उड़ान

पंखों पर उड़ने को ज़माना आज भी बेताब है |
मेरी उड़ान है फीकी, मेरे पंखों पे तेज़ाब है |

परिंदे जो घोसलों से गिर पड़े फिर उड़ेंगे,
कल भले थे कांटे, आज क़दमों तले गुलाब है |

क्यूँ टूटना चाहते हैं बादल पहाड़ों की चोट से,
क्यूँ मचाया कश्तियों ने साहिल पे सैलाब है |

बेकार गुफ्तगू है, क्या अंजाम होगा हौसलों का,
होश पर भारी  नशा है, नशे पे भारी शराब है |

नीयत पे सवाल है खुदके, पर ये पूंछता हूँ ,
नेकी है कहाँ आजकल, ज़माना बड़ा ख़राब है |
 
' अतुल '

अंदाज़-ए-मुहब्बत

बड़ी गुमनाम गलियां हैं, हमें सब गैर बताते हैं |
कोई है रूबरू हमसे शक्ल पर बैर दिखाते हैं |

थोड़े इशारे कर के छुप गए हैं वो जुगनू जिन्हें,
हम परवाने जानकार जाने कब से जलाते हैं |

इस ज़िन्दगी का एक पल तो खुल के हम जीलें,
कि इस इक पल भी वोह हमसे खुदको छुपाते हैं |

अभी भी डर गए तो कब उठेंगे अरमान अनकहे,
उम्रभर के वादों को चलो इसी पल निभाते हैं |

दूरियां हैं ऐसी हम उन्हें कोस भी तो नहीं सकते,
इन्हीं फासलों से वो हमसे मुहब्बत जताते हैं | 

' अतुल '



खैर

हर बार मुझे वोह अपनों में गैर करते हैं,
खूब है दीवाने जलते हैं बेवफा खैर करते हैं |

सम्हाल के रखते हैं कदम वोह मेरे सामने,
और हर शब् ख्वाबों में मेरे सैर करते करते हैं |

कई तमन्नाएं बनीं नासूर मेरे सीने में,
वो मेरी हर अदा से क्यूँ भला बैर करते हैं |

झोंक कर अंगारों में मुहब्बत के चिराग,
ज़िन्दगी के आशियाने की हम खैर करते हैं |

' अतुल '

ग़ज़ल : वो लोग

मोहताज हैं जो किस्मत के वो खाक सज़ा देते हैं,
महरूम थे जो उजालों से वोह चिराग बुझा देते हैं |

भीड़ में घुसते हैं जो मुजरिम ढूँढने के बहाने से,
पूंछो तो उनसे वोह किसको पास पनाह देते हैं |

वोह डरते थे इल्जामों से इस कदर कि छुप गए,
वोह ही तो खुद अफ्वाओं को हर बार हवा देते हैं |

खामोश थे हर मुकद्दमे में नजाने क्यूँ अब तलक,
क्यूँ आज वो ही अकेले इन्साफ को सदा देते हैं |

और हसने से हम थे डरते, नज़रों से बचते थे,
आज हम भी खुशियों को दिल से वफ़ा देते हैं |


  ' अतुल '

धनुषकोडी की यात्रा

शायरी ब्लॉग पर एक यात्रा वृत्तान्त थोडा अजीब लगता है पर मैं इतनी छुट अवश्य लूँगा |  कुछ समय की लीवर की तकलीफ के ठीक होते ही मां ने जिद्द पकड़ ली कि अब जो हों जाये शिवजी के परम धाम रामेश्वरम तो जाना ही चाहिए और पिताजी ने ज़यादा विरोध भी नहीं किया | तो फिर क्या था, हम सब निकल पड़े | रामेश्वरम बड़ा ही भव्य था पर उसके बारे में लिखना पसंद नहीं करूंगा | दो कारणों से - पहला ये कि रामेश्वरम पर तो बहुत लेख यूँ ही मिल जायेंगे और दूजा ये कि मैंने रामेश्वरम में ऐसा कुछ ख़ास नहीं पाया जिसपर अपने विचार व्यक्त कर सकूं | तो फिर आपका ये प्रश्न कि मैं आखिर क्या लिखूंगा, बड़ा ही स्वाभाविक है और उतना ही जितना मेरा धनुषकोडी के बारे में लिखना |

अनेकानेक मंदिरों में माथा टेकने के बाद, मठों में शांति अनुभव करने के बाद, तैरते पत्थर (जो दरअसल कोरल जीव थे ) देखने के बाद भी  मैं इस बात से सहमत नहीं था कि कभी राम ने इतिहास में ऐसा कोई पुल बांधा भी था | विज्ञानं का अनुयायी होने के कुछ अनचाहे परिणामों में से एक श्रद्धा का कम होना भी है | हालाकि मैं ऐसा नहीं मानता कि मेरी ईश्वर पर से श्रद्धा  कम होती है पर हाँ राम पुल पर से तो भरोसा उठ ही गया | शायद इसी लिए मैं उन सब पर लिखना नहीं चाहता | पर रामेश्वरम में मंदिरों और आस्था वाले समता स्थलों से हट कर भी कुछ था जो मेरे लिए रामेश्वरम धाम में शिव दर्शन जैसा ही महत्व रखता है | और वह है धनुषकोडी का अद्भुत अनुभव |


रामेश्वरम के प्रमुख धराखंड से एक पतली सी रेतीली पट्टी से जुड़ा हुआ है एक अद्भुत रेतीला छोर, एक छोटा सा गाँव जिसे धनुषकोडी के नाम से जाना जाता है | पर ये गाँव सिर्फ एक गाँव नहीं है ये प्रकृति की अद्भुत शिल्प कला का नायाब प्रदर्शन है | दोनों तरफ से ही समुद्र से घिरा है ये गाँव और जहाँ एक तरफ समुद्र तलब जैसा शांत है वहीँ दूसरी ओर से समुद्र के विकराल स्वरुप का परिचायक | पूर्व दिशा से पानी में हलकी हलकी मौजें उठ रहीं थी और उसकी ज़िम्मेदारी भी हवा कि गति ले रही थी | कुछ मीटर की दूरी पर पश्चिन किनारे पर लहरें इस फासले को खत्म करने पर उतारू हों रहीं थीं | साथ चलते आदमी ने मेरे अध्ययन करते स्वाभाव को पहचानते हुए तमिल में कुछ कहा मैं लगभग यही समझ पाया कि वो लहरों के विषय में कुछ बताने की चेष्टा कर रहा था | मैंने एक बड़ी मुस्कान के साथ कहा कि मुझे तमिल नहीं आती ' तमिल इल्लै '| इस पर वो हसने लगा और अपने साथ के एक पुरुष से कुछ कहा और फिर अपनी अंग्रेजी पर पूरा जोर लगाया और कुछ टूटी फूटी अंग्रेजी में भाव प्रकट किया | उस पुरुष के अनुसार आधे वर्ष समुद्र एक ओर शांत रहता है और आधे वर्ष दूजी ओर  | मैं इतना ही समझ पाया या फिर यूँ कहें कि वह इतना ही समझा पाया |

धनुष कोडी का रास्ता इतना रेतीला और कीचड़ से भरा हुआ था कि ड्राईवर के हुनर की दाद देनी पड़ेगी | उसने मक्खन कि तरह गाड़ी को घुमाया और ज्यादा तकलीफ दिए बिना ही हमें गाँव ला पहुँचाया | कुछ ही देर में खंडहरों से भरा गाँव दिखने लगा | चारों ओर कंटीले पौधे उगे हुए थे रेत में कहीं छुपती और कभी दिखती एक रेल पटरी के अवशेष थे | वहीँ एक ढांचा बना हुआ था जो एक रेल प्लेटफोर्म की छवि बना रहा था | कुछ ऊँचे पक्के मकानों के खँडहर भी थे जो अंग्रेजों के ज़माने के डिजाइन लग रहे थे | कुछ इतने मज़बूत कि अभी भी शान से खड़े थे हालाकि काफी हद तक उन पर पेड़ पूछे उग गए थे | ऐसा प्रतीत हों रहा था कि धनुषकोडी खुद में किसी विनाश की कहानी को अपने अन्दर दबाए हुए था |


 एक भद्र पुरुष ने पिताजी के साथ बात छेडदी | पता चला कि यहाँ एक अच्छा खासा गाँव हुआ करता था और यहाँ रेल स्टेशन , अस्पताल , पोस्ट ऑफिस, जेट्टी (छोटा पोत गृह ) , फिशेरी ऑफिस सब हुआ करता था | १९६१ तक यहाँ से श्री लंका के लिए नावसेवा हुआ करती थी क्यूँकि यह श्रीलंका के सबसे करीब छोर था | तब यह काफी सुन्दर, विकसित और संपन्न पर्यटक स्थल था | १९६१ के तूफ़ान ने ऊंची लहरों से इस गाँव को निगल लिया, अब यह खंडहरों से भरपूर एक मायूसी का प्रचारक मात्रा रह गया है | समय समय पर समुद्र धनुषकोडी को बाकी खंड से अलग करने के प्रयत्न करता रहता है | मनुष्य और प्रकृति एक दुसरे से लड़ते दिखे | प्रकृति परम शक्तिशाली अवश्य है पर मनुष्य के मनोबल और सहनशक्ति की भी कोई सीमा नहीं होती | वहां कुछ ही पक्के मकान बचे दिखे और उनमें से एक है चर्च और दूसरी है पाठशाला | लोग कच्चे मकानों में रहते दिखे | पास में ही एक बच्चा (बच्चा कहना गलत होगा, वो काफी बड़ा था ) लंगोट में ताड़ के पेड़ की छाँव में निद्राधीन दिखा | अन्य वातावरण में यह अश्लील कहा जा सकता था पर भीषण गर्मी देखते हुए न केवल मुझे वो सही जान पड़ा बल्कि लगा कि या तो मैं भी सामाजिक व्यवधानों को भूल जाऊं या फिर सागरमग्न हों जाऊं | पर मैंने आगे बढ़ना बेहतर समझा |


चौंकाने वाली बात तो ये थी कि धनुषकोडी जैसे धार्मिक तौर पर महत्त्वपूर्ण स्थान पर मैंने एक मंदिर नहीं पाया | मान्यता है कि श्री राम ने यहीं से लंका के लिए अपने धनुष से सेतु बनाने के लिए पहली लकीर खींची थी और फिर सीता को मुक्त करने के पश्चात् जब वो लौटे तो विभीषण के आग्रह पर उन्होंने अपने धनुष के प्रहार से सेतु को नष्ट कर दिया | इसी कारण इसका नाम पड़ा "धनुषकोडी" अर्थात धनुष का छोर (अंत)| मान्यता यह है कि कशी यात्रा बिना रामेश्वरम दर्शन और धनुषकोडी स्नान के साम्पन नहीं समझे जाते |

आखिर हम वहां पहुंचे जहाँ बंगाल कि खाड़ी और हिंद महासागर का सुन्दर आलिंगन हों रहा था | यह हिस्सा एक लम्बा रेतीला छोर था | सुन्दरता बस देखते ही बन रही थी | थोड़ी देर के लिए मैं भूल गया था कि तपता सूरज हमारे इस विचरण से खुश नहीं था | वहीँ एक औरत मोतियों की मालाएं और झुमके बेचती दिखी और मां का ध्यान आभूषणों की सुन्दरता की ओर चला गया | पर सच पूंछे तो उन मोतियों की बात ही निराली थी | बड़े बड़े प्रकृति के समुद्रीय नज़राने कड़ी धूप में हीरों से भी भव्य प्रतीत हों रहे थे | वो मोती बाज़ार के मोतियों से अलग थे | साथ ही में कुछ और रत्ना भी थे | औरत ने मां को मोतियों से मोहने के बाद दाम बताया | और बिना ज्यादा तोल मोल लिए मां ने उन्हें खरीद लिया | मैंने कुछ और मोती बिने पर अपने कैमरे में | सुन्दर तस्वीरें खींच कर हमने सूर्य देवता के आगे आत्मा समर्पण कर दिया और जा कर गाडी में बैठ गए | लौटे हुए मैंने आँख भर कर सब कुछ जितना हों सके सब बटोरना शुरू कर दिया| देखते देखते छोर गायब होने लगा | खँडहर रेत के पीछे छुपने लगे और धीरे धीरे सूरज भी अपनी भड़ास निकल कर शांत हों गया | बाकी सब गाड़ी में सो चुके थे और मैंने भी धनुषकोडी के आखरी नज़ारे के साथ मैंने भी ऑंखें बंद करलीं |
(लेख के साथ की तसवीरें छवियाँ मेरी नहीं हैं, इनका श्रेय उनको खींचने वाले सज्जनों को जाता है | ) 

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